उदयपुर। निःसंतान पुरुषों के लिए टीसा तकनीक वरदान साबित हो रही है। शुन्य शुक्राणुु वाले पुरुष भी अपने ही शुक्राणुओं से पिता बन सकते है। ऐसा ही एक मामला गीतांजली मेडिकल काॅलेज एवं हाॅस्पिटल, उदयपुर के फर्टिलिटी केंद्र पर संभव हुआ। शुन्य शुक्राणु होने के बावजूद पुरुष के अपने ही शुक्राणु से महिला ने आईवीएफ द्वारा गर्भधारण कर आईवीएफ विशेषज्ञ डाॅ पूजा गांधी ने उदाहरण पेश किया है। इस टीम में उनके साथ यूरोलोजिस्ट डाॅ विश्वास बाहेती, एम्ब्रियोलोजिस्ट सुरेश, आईवीएफ लेब असिस्टेंट अंकेश व कांता शामिल थे। डाॅ पूजा गांधी ने बताया कि नमन (परिवर्तित नाम) के शुन्य शुक्राणु होने के कारण कई हाॅस्पिटल ने इलाज के लिए यह कह कर मना कर दिया था कि वह अपने शुक्राणु से पिता नहीं बन सकता। और उसे डोनर के शुक्राणु की आवश्यकता पड़ेगी। गीतांजली फर्टिलिटी सेंटर पर परामर्श व हार्मोन की जांचें (टेस्टोस्टोरोन, एफएसएच व एलएच) की गई। इन जांचों से पता चला कि शुक्राणु बन तो रहे है पर बाहर नहीं आ पा रहे है। इसे आॅब्स्ट्रकटिव एजूस्पर्मिया कहते है। जिसके बाद रोगी का टीसा प्रक्रिया द्वारा इलाज किया गया। और नमन के अपने ही शुक्राणु से विमला देवी ने आईवीएफ द्वारा गर्भधारण किया। टीसा (TESA) क्या होता है? कम शुक्राणु संख्या पुरुष बांझपन का एक सामान्य कारण है। जो पुरुष अवरुद्ध ट्यूब या अनुवांशिक कारणों से शुक्राणुओं को बाहर नहीं निकाल पाते है, तब एक सूक्ष्म शल्य क्रिया से कुछ शुक्राणुओं की प्राप्ति की आवश्यकता होती है जिससे आईसीएसआई या आईवीएफ किया जा सके। इस प्रक्रिया को टीसा कहते है। इसमें अंडाशय की त्वचा के माध्यम से सुई से अंडकोष के अंदर मौजूद तरल पदार्थ को बाहर निकाला जाता है। इस रोगी में भी इसी तकनीक द्वारा शुक्राणुओं को बाहर निकाला गया और आईवीएफ की मदद से प्रयोगशाला में अंडों और शुक्राणुओं को निषेचन प्रक्रिया द्वारा संयोजित कर भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित किया गया। आॅब्स्ट्रकटिव एजूस्पर्मिया किसे कहते है? आॅब्स्ट्रकटिव एजूस्पर्मिया पुरुष के शुक्राणुओं की स्खलन की समस्याओं के कारण होता है। इसमें शुक्राणु होते तो है परंतु बाहर नहीं आ पाते है। अधिक जानकारी हेतु सम्पर्क करें: डाॅ पूजा गांधी: 81078 51734 / 88908 29878