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15 माह के शिशु की सफल जटिल ओपन हार्ट सर्जरी

गीतांजली मेडिकल काॅलेज एवं हाॅस्पिटल, उदयपुर द्वारा आयोजित पत्रकार सम्मेलन में इंट्रा कार्डियक रिपेयर सर्जरी एवं आरवीओटी स्टेंटिंग पर विस्तृत चर्चा हुई। इस सम्मेलन में गीतांजली के कार्डियक थोरेसिक एवं वेसक्यूलर सर्जन डाॅ संजय गांधी ने बताया कि हृदय शल्य चिकित्सा, हृदय रोग एवं बाल एवं शिशु विभाग की टीम ने अपने संयुक्त प्रयासों के चलते उदयपुर निवासी दीपक खटीक उम्र 18 माह तथा मात्र 5 किलो वजनी शिशु के हृदय में प्रत्यारोपित स्टेंट निकालकर इंट्रा कार्डियक रिपेयर सर्जरी कर नया जीवन प्रदान किया।

5 से 6 घंटें चले इस ऑपरेशन को सफल बनाने वाली टीम में डाॅ संजय गांधी के साथ कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डाॅ अंकुर गांधी, डाॅ मनमोहन जिंदल, डाॅ कल्पेश मिस्त्री, डाॅ आशीष पटियाल, कार्डियोलोजिस्ट डाॅ कपिल भार्गव, डाॅ रमेश पटेल, डाॅ डैनी कुमार एवं डाॅ शलभ अग्रवाल, बाल एवं शिशु रोग विभागाध्यक्ष डाॅ देवेंद्र सरीन, नियोनेटोलोजिस्ट डाॅ धीरज दिवाकर, समस्त ओटी व आईसीयू स्टाफ का महत्वपूर्ण योगदान रहा। हृदय विशेषज्ञों के दल ने यह दावा किया है कि यह सर्जरी राजस्थान में प्रथम अपनी तरह का सफल हृदय ऑपरेशन है।

क्या था मामला?

डाॅ रमेश पटेल ने बताया कि उदयपुर निवासी दीपक खटीक जन्म से ही ज्यादा रोने पर नीला पडने के साथ ही बेहोश हो रहा था। आपातकालीन स्थिति में शिशु को गीतांजली हाॅस्पिटल में भर्ती कर तुरंत उपचार प्रारंभ किया गया। शिशु की ईको कार्डियोग्राफी एवं कैथ एंजियोग्राफी की जांचों में पता चला कि वह जन्मजात हृदय रोग ‘टेट्रोलोजी ऑफ़ फैलाॅट’ नामक बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी में हृदय में एक बड़े छेद के साथ फेफड़ों तक जाने वाली नाड़ी में रुकावट होती है। जिसका इलाज सर्जरी द्वारा किया जाता है। परंतु शिशु की गंभीर हालत एवं कम वजन को देखते हुए सर्जरी का रिस्क बहुत ज्यादा था। इस बीमारी से पीड़ित कुछ रोगियों का शंट ऑपरेशन भी किया जाता है परंतु उसमें भी रिस्क बहुत ज्यादा होता है। जिस कारण इस नवजात में बिना चीरे के ऑपरेशन करने का निर्णय लिया गया। नवजात की हालत को स्थिर करने के लिए एवं सफल सर्जरी करने के लिए आरवीओटी स्टेंटिंग की गई, जो कि विश्व में इस तरह के अब तक केवल 100 मामलों में आरवीओटी स्टेंटिंग की गई है। इससे उचित रक्त फेफड़ों में जाने लगा और नवजात को ऑक्सीजन मिलने लगी। इस प्रक्रिया के बाद शिशु का वजन भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा और नीलेपन के दौरे भी कम होने लगे। स्तनपान के साथ-साथ वह अन्य खाद्य पदार्थ खाने में भी सक्षम हो पाया। तत्पश्चात् शिशु के हृदय में से स्टेंट निकालकर पूर्ण इंट्रा कार्डियक रिपेयर सर्जरी की गई।

हृदय शल्य चिकित्सक द्वारा क्या इलाज किया गया?

हृदय शल्य चिकित्सक डाॅ संजय गांधी ने बताया कि ऐसे मामलों में सर्जरी बहुत जटिल होती है। इस शिशु में भी हृदय में छेद एवं नाड़ी में रुकावट को खोलने से पहले कार्डियोलोजिस्ट द्वारा लगाया गया स्टेंट हटाना जरुरी था। यह स्टेंट हृदय के अंदर मांसपेशियों में लगाया गया था जो हृदय की दीवार से चिपक गया था। इस स्टेंट को बहुत ही सावधानी से हटाया गया अन्यथा हृदय कभी-भी फट सकता था। स्टेंट हटाने के पश्चात् हृदय में छेद को बंद किया गया एवं नाड़ी में रुकावट को खोल दिया गया। इस सर्जरी को इंट्रा कार्डियक रिपेयर सर्जरी कहते है जिसमें हृदय को पूरा सामान्य किया गया। इस ऑपरेशन में 5 से 6 घंटें का समय लगा। इस सर्जरी में हार्ट-लंग मशीन एवं शिशु के सर्जरी में उपयोग में आए जाने वाले सभी छोटे उपकरण लगे जो गीतांजली कार्डियक ऑपरेशन थियेटर में मौजूद है।

डाॅ गांधी ने यह भी बताया कि दो हजार में से केवल 1 शिशु में पाए जाने वाली इस बीमारी में त्वरित उपचार की आवश्यकता होती है। किन्तु इतने कम वजनी शिशु का उपचार करना काफी जटिल होता है। सामान्यतः डेढ़ वर्षीय शिशु का वजन लगभग 10 किलो के आस-पास होता है परंतु इस शिशु का वजन मात्र 5 किलो था।

पत्रकार सम्मेलन में गीतांजली के कार्यकारी निदेशक अंकित अग्रवाल ने हृदय रोग विशेषज्ञों की टीम को सफलता की बधाई देते हुए कहा कि गीतांजली हाॅस्पिटल इस तरह की और नई चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भविष्य में इनसे और कुशल तरीके से निपटने के लिए चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में नए कोर्सिज एवं ट्रेनिंग प्रोग्राम को सम्मलित करेगा जिससे उदयपुर एवं आस-पास की जनता को राजस्थान से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

गीतांजली के सीईओ प्रतीम तम्बोली ने बताया कि गीतांजली का एकमात्र उद्देश्य रोगी को बीमारी से निजात दिलाने के साथ-साथ सामान्य जीवन प्रदान करना है। गीतांजली हाॅस्पिटल चिकित्सा के हर क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं गुणात्मक चिकित्सा सेवा के साथ नवीनीकरण के प्रति प्रतिबद्ध है। वर्तमान में गीतांजली टरशरी केयर से आगे पहुँच क्वार्टरनरी केयर प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस सफल सर्जरी के पीछे गीतांजली के विभिन्न चिकित्सा विभागों में बेहतरीन सामंजस्य के साथ-साथ उनका सामान्य ध्येय यही था कि परिवार के दीपक की लौ जलती रहनी चाहिए।